"इतिहास ना बदल जाए"
आज फिर सिंटू बन्ना के शब्द अपनों को दर्द न दे जाए,
आज फिर कहीं लिखते- लिखते रोना न आ जाए ।
जरा वक्त निकाल सोचो कहाँ थे हम और अब कहाँ आ गये है,
डर रहा हूँ यह सोच कर की कहीं अस्तित्व हमारा भी खो न जाए ।।
कुछ चन्द लोगों को मान लिया समाज का ठेकेदार हमने ,
कहीं उन ठेकेदारों के हाथों समाज नीलाम न हो जाए।
नही लेता इन अपनों के नाम सरेआम इस डर से ,
की कही नाम उनका बदनाम ना हो जाए ।।
कई दशक हो गये सहन करते हुए अब तो उठो ,
कही अत्याचार सहना हमारा स्वभाव न बन जाए।
कर रहा हूँ कोशिश अपना अतीत वापस लाने की ,
कहीं इस कोशिस मे नाम मेरा विरोधियों मे ना जुड़ जाए ।।
सर कटाये है क्षत्रियों ने जोहर किये है क्षत्राणीयों ने,अब तो उठो ,
कही लोगों को खून की पवित्रता पर शक होने ना लग जाए ।
मर गये अपने पूर्वज क्षत्रियता निभाते निभाते ,
कोशिश करो उनके प्रयास कागजों मे सिमट कर ना रह जाए ।।
मांगता हूँ दुआ जब भी देखता हूँ वर्त्तमान स्थिति को ,
की कहीं शुद्र सा हमारा भविष्य ना हो जाए ।
कर रहा हूँ इंतजार अपनों के बदलने का,
कही इस इंतजार मे जिंदगी तमाम ना हो जाए ।।
डर रहा हूँ वर्तमान चाल चलन को देख कर ।
की कही संस्कृति हमारी भी लुप्त ना हो जाए ।
चिन्तित होता हूँ जब भी सोचता हूँ अकेले में ,
की कही भविष्य मे हम फिर से गुलाम ना हो जाए ।।
यह लोकतन्त्र है यहाँ सरकारे बदलेंगी तख्त बदलेंगे ,
हम भी कही इन लोकतान्त्रिक पार्टियों के दास ना बन जाएँ ,
सत्ता मे बने रहना है तो अपनी एकता की ताकत दिखाओ ।
वरना कहीं जोधा-अकबर की तरह संपूर्ण इतिहास ना बदल जाए ।।

No comments:
Post a Comment