Monday, 30 June 2014

शेर की दहाड़ हूँ
वक्त की पुकार हूँ
शिव का त्रिशूल हूँ
खुद का उसूल हूँ
भारत माँ का सपूत हूँ
मैं राजपूत हूँ

राज बदल दुँगा तेरा,
मै ताज बदल दुँगा|
नजर मिलाई मुझसे तो,,
पहचान बदल दुँगा|
तन मै दौडता,
रक्त मेरे राजपुत पुरवजो का,, अपनी हैसियत समझ ले,,
वरना तेरी औकात बदल दुँगा||


"दुश्मनों' की कभी सुबह शाम ना होने देगे"....
"राजपुताना " की कुरबानी कभी बदनाम
ना होने देगे".....
होगी " लहू" की एक बूंद
भी रगों में"...!!
तब तक "राजपुताना " का आंचल कभी नीलाम
ना होने देगे"....!!!!

मिट गये मिटाने वाले,
ना सका कोई मिटा ।
झुक गये झुकाने वाले,
ना सका कोई झुका ।।
.
सर कटाने को रहे सदा त्यार
पर कभी, सर झुकाया नहीं ।
महलों को त्याग भटके जंगल,
पर स्वाभिमान डगमगाया नहीं ।।


शेर कभी छुप कर शिकार नहीं करते ,
बुजदिल कभी खुलकर वार नहीं करते,
अरे हम तो राजपूत हैं राजपूत ,
और राजपूत कभी मरके भी हार
स्वीकार नहीं करते !!

जूलम कि पहचान मिटा के रख दे
राजपूत चाहेतो कोहराम मचा के रख दे
राजपूतअभी सुखे पत्तो कि तरह बिखरे है ! 
हम राजपूत अगर हो जाए एक तो दुनिया हिला दे 

किसने कह दिया की राजपुत एक हो नही सकते ।
हाँ ये सही है की बँजङ खेत के अन्दर बीज बो नही सकते।
झाङीयो को काट के खेत को सुधारा जाता है।
कोई भी हो सँकट मे तो क्षत्रीयो को पुकारा जाता है।
हो सकता है शेर गहरी नीँद मे सो गया है।
थोङे समय के लिये क्षत्रीय भी कहीँ खौ गया है।
अब हमे वो हूँकार भरनी है जो महाराणा ने भरी थी।
एक बार वो तलवार उठानी है जिससे हल्दीघाटी मे लाखो लाशे गिरी थी।
जीनके दिल कमजोर है वो हमसे परे जाओ।
बचे हुए सब क्षत्रीय धर्म मे खरे हो जाओ।
हमे तो बस क्षत्रिय धर्म और सँस्कार को अपनाना है।


राजपूत कंगाल होकर भी राजा कहलाएगा ,
जो पैदा हुआ है इस कौम मे कभी न सर झुकाएगा
वार पीठ पर करना नहीं है राजपुती शान 
भले ही यारो चले जाए राजपूत के प्राण 


मेरा कत्ल कर दो,कोई शिकवा न होगा,
मुझे धोखा दे दो,कोई बदला न होगा,
पर उठी जो आँख मेरे ' धर्म ' पर,
तो उठेंगी तलवारे,और कोई समझौता न होगा...


अपने आप को ठाकुर कहते हो तो,जीवन मे ठकुराई रखो।
तलवार नही रखते अब हाथ मे, तो जीवन मे रजपुताई तो रखो॥
स्वार्थी हे ये दुनिया कुछ तो ईससे सिखो ।
राजपुत लिखते थे भविष्य दुनिया का
कम से कम खुद का तो अब भी लिखो॥

Monday, 23 June 2014

अ-अः

  • अकल बिना ऊंट उभाणा फिरैं ।
  • अगम् बुद्धि बाणिया पिछम् बुद्धि जाट ...बामण सपनपाट ।
  • आंध्यां की माखी राम उडावै ।
  • आसोजां का पड्या तावडा जोगी बणग्या जाट ।
  • ऊन'रै को जायेड़ो बिल ही खोदै ।

क-घ

  • क ख ग घ ड़, काको खोटा क्यों घडै ।
  • कपूत हूँ नपूत भलो ।
  • कर रै बेटा फाटको, खड्यो पी दूध को बाटको ।
  • काणी के ब्याह में सो टेड ।
  • काम का ना काज का ... ढाई मण अनाज का ।
  • कौड़ी बिन कीमत नहीं सगा नॅ राखै साथ, हुवै जे नामों (रूपया) हाथ मैं बैरी बूझै बात।
  • खरी कमाई घणी कमाई ।
  • खेती करै नॅ बिणजी जाय, विद्या कै बल बैठ्यो खाय ।
  • गादड़ै की मोत आवै जणा गांव कानी भागै।
  • गोदी मैं छोरो गळी मैं हेरै ।
  • घी सुधारै खीचड़ी, और बड्डी बहू का नाम ।
  • घैरगडी सासू छोटी भू बडी ।

च-झ

  • च्यार चोर चौरासी बाणिया, बाणिया बापड़ा के करँ ।
  • छड़ी पड़ै छमाछम, विद्या आवै धमाधम।
  • ज्यादा स्याणु कागलो गू मैं चांच दे ।
  • जाओ लाख रैवो साख, गई साख तो बची राख ।
  • जंगल जाट न छोड़िये,हाटां बीच किराड़। रांगड़ कदे न छोड़िये,ये हरदम करे बिगाड़।।
  • जमीन ऍर जोरु जोर की नहीं तो कोई और की।
  • जाट जंवाई भाणजो, रेवारींरु सुनार । ऐता नहीं है आपणा, कर देखो उपकार ।।
  • जाट बलवान जय भगवान ।
  • जाट मरा जब जानिये जब चालिसा होय ।
  • जैं करी सरम, बैंका फूट्या करम ।
  • जो गुड़ सैं मरै बी'नै जहर की के जरुरत।

ट-ढ

  • डाकण बेटा ले क दे ।

त-न

  • तीज त्यौहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर।
  • दियो लियो आडो आवै ।
  • दूसरे की थाळी मँ घी ज्यादा दीखॅ।
  • दूसरे की थाळी में सदा हि ज्यादा लाडू दीखैं ।
  • धन्‍ना जाट का हरिसों हेत, बिना बीज के निपजँ खेत।
  • नानी फंड करै, दोहितो दंड भरै ।
  • नेपॅ की रुख खेड़ा'ई बतादें ।

प-म

  • पूत का पग पालणें में ही दीख जा हीं ।
  • पत्थर का बाट - जत्ता भी तोलो, घाट-ही-घाट ।
  • पीसो हाथ को, भाई साथ को ही काम आवै ।
  • बहुआं हाथ चोर मरावै, चोर बहू का भाई ।
  • बाप ना मारी मांखी, बेटो तीरंदाज ।
  • बाबो सगळां'नॅ लड़ॅ, बाबॅ'न कुण लड़ॅ ।
  • बिना बुलाया पावणा, घी घालूं कॅ तेल ।
  • बिना रोऍ तो मा'ई बोबो कोनी दे ।
  • बीन कॅ'ई लाळ पड़ँ जणा बराती के करँ ।
  • बैठणो छाया मैं हुओ भलां कैर ही, रहणो भायां मैं हुओ भलां बैर ही ।
  • भौंकँ जका काटँ कोनी ।
  • मन का लाडु खाटा क्यों ।
  • म्हानैं घडगी अ'र बेमाता बाड़ मैं बड़गी ।
  • मँगो रोवे ऐक बार, सस्तो रोवे सो बार ।
  • मानो तो देव नहीं तो भींत को लेव।
  • मेवा तो बरसँता भला, होणी होवॅ सो होय ।
  • मेह की रुख तो भदवड़ा'ई बता दें ।

य-व

  • रांड स्याणी हुवै पण कसम मर्यां फेर ।
  • रूप की रोवै करम की खावै ।
  • रूपयो होवै रोकड़ी सोरो, आवै सांस, संपत होय तो घर भलो, नहीं भलो परदेस।
  • रोता जां बै मरेडां की खबर ल्यावैं ।

श-ह


  • सरलायो छूंदरो, बद्दां बंध्यो जाट । मदमाती गूजरी, तीनों वारां बाट ।।
  • साबत रैसी सर तो घणाई बससीं घर।
  • सात घर तो डाकण भी छोड दिया करै है।
  • सावण भलो सूर'यो भादुड़ो पिरवाय, आसोजां मैं पछवा चाली गाडा भर भर ल्याव ।
  • हाँसी-हाँसी में हो-ज्यासी खाँसी ।

Friday, 9 May 2014

"धरती माता किसने राखी लाज तेरे सम्मान की"
धरती माता किसने राखी लाज तेरे सम्मान की ।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।
हाँ गाथाएं बलिदान की।।
काबुल के तूफानों से जब मानस था थर्राया।
गजनी की आंधी से जाकर भीमदेव था टकराया।।
देख खानवा यहाँ चढ़ी थी राजपूत की त्योरियां।
मतवालों की शमशीरों से निकली थी चिंगारियां।।
यहाँ कहानी गूँज रही सांगा के समर प्रयाण की।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।
देखो इस चित्तोड दुर्ग का हर पत्थर गौरव वाला।
यहाँ चढाई कुल देवी पर शत-शत मुंडो की माला।।
महलों में जौहर धधका हर राजपूत परवाना था।
हर हर महादेव नारों से अवनि अम्बर गूंजा था।।
यहाँ कथाएं गूंज रही कण कण में गौरव गान की।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।
यही सीकरी वह पानीपत यही वही हल्दीघाटी।
वीर बांकुरों के शोणित से तृप्त हुई जिसकी माटी।।
हाल बता बुन्देल धरा तेरे उन वीर सपूतों का।
केशरिया कर निकल चुके थे मान बचाने माता का।
भूल गए तो याद करो उस पृथ्वीराज महान की।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।
आन-बान हित कई बांकुरे आजीवन थे जहां लड़े।
यवन सैन्य के झंझावत से पर्वत बनकर यहीं अड़े।।
क्षिप्रा झेलम बोल जरा क्यों लाल हुआ तेरा पानी।
महाकाल से यहाँ जूझने दुर्गा की थी भृकुटी तनी।।
तेरी ही वेदी पर माता चिता जाली अरमान की।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।
महाराणा सा सपूत पाकर धन्य हुई यह वसुंधरा।
जैमल फत्ता जैता कुम्पा झाला की यह परंपरा।।
जिन्दा है तो देख जरा जालोर गढ़ और उन्टाला।
तारागढ़ और रनतभंवर में लगा शहीदों का मेला।
आओ फिर से करे प्रतिष्ठा उस पावन प्रस्थान की।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।
तडफ रहे हैं परवाने उसी शमा पर चढ़ने को।
आग उठी है रग रग में फिर से बदला ले लेने को।।
भभक रहे हैं अब अंगारे प्रतिहिंसा के झोंको से।
भीख मांगता महांकाल निर्वासित राजकुमारों से।।
जगो यहाँ पर जग्देवों की लगी है बाजी जान की।
अलबेलों ने लिखी खडग से गाथाएं बलिदान की।।

Wednesday, 5 February 2014

इस राजपूती ठाट ने ही तो हमे ठगा है ।

बरबाद हो गये हम जब से दारु का चस्का हमे लगा है॥



लाख टके का आदमी पी के एक टके का बन जाता है।


क्योकी पी दारु बेटा बाप के सामने ही तन जाता है॥



पीते ही दारु घूम जाती है यारो अपनी बुद्धि।


सँकल्प लो क्षत्रिय वीरो करनी होगी हमे समाज की शुद्धी॥



क्षत्रियो के लिये बने इस कलँक को अब छोङना होगा।


राजपूत तो शराबी होते है दुनिया के इस भ्रम को तोङना होगा॥



जिसने क्षत्रियोँ को छेङा उसे क्षत्रियो ने साबूत नही छोङा है।


फिर कैसे बच गई ये दारु जिसने क्षत्रियो की कमर को पुरी तरह से तोङा 


है॥


या तो क्षत्रिय कमजोर और कायर हो गये या दारु महान है।


वरना हम कैसे भूल गये की हम मर्यादापुरुषोतम राम की सन्तान है॥



सँकल्प लो क्षत्रियो शराब है खराब इसे हम छोङ देँगे।


अपनायेँगे मर्यादा को और दुनिया को राम राज्य की और मोङ देँगे॥



JAI RAJPUTANA

Monday, 6 January 2014


जननी जणे तो चार ही जणजे , तु मती जणजे चालिस ॥

 वॆ चारो रण मे झुझता ,तो वे चारो है चालिस॥ 

                         जननी जणे तो एडा जणजे , भगत,दाता या शूर ॥

                             नही तर रहिजे बान्जनी , तु मती घमाजे नूर ॥ 



चढ़ चेतक पर तलवार उठा रखता था भूतल–पानी को। 

राणा प्रताप सिर काट–काट करता था सफल जवानी को।। 

             कलकल बहती थी रण–गंगा अरि–दल को डूब नहाने को। 

               तलवार वीर की नाव बनी चटपट उस पार लगाने को।।


वैरी–दल को ललकार गिरी¸ वह नागिन–सी फुफकार गिरी। 

था शोर मौत से बचो¸बचो¸ तलवार गिरी¸ तलवार गिरी।।

           पैदल से हय–दल गज–दल में छिप–छप करती वह विकल गई! 

         क्षण कहां गई कुछ¸ पता न फिर¸ देखो चमचम वह निकल गई।। 

क्षण इधर गई¸ क्षण उधर गई¸ क्षण चढ़ी बाढ़–सी उतर गई। 

था प्रलय¸ चमकती जिधर गई¸ क्षण शोर हो गया किधर गई।


क्या अजब विषैली नागिन थी¸ जिसके डसने में लहर नहीं। 

उतरी तन से मिट गये वीर¸ फैला शरीर में जहर नहीं।। 

             थी छुरी कहीं¸ तलवार कहीं¸ वह बरछी–असि खरधार कहीं। 

                   वह आग कहीं अंगार कहीं¸ बिजली थी कहीं कटार कहीं।। 



लहराती थी सिर काट–काट¸ बल खाती थी भू पाट–पाट। 

बिखराती अवयव बाट–बाट तनती थी लोहू चाट–चाट।|

                     सेना–नायक राणा के भी रण देख–देखकर चाह भरे। 

                         मेवाड़–सिपाही लड़ते थे दूने–तिगुने उत्साह भरे।। 


क्षण मार दिया कर कोड़े से रण किया उतर कर घोड़े से। 

राणा रण–कौशल दिखा दिया चढ़ गया उतर कर घोड़े से।। 

                क्षण भीषण हलचल मचा–मचा राणा–कर की तलवार बढ़ी। 

                    था शोर रक्त पीने को यह रण–चण्डी जीभ पसार बढ़ी।। 


वह हाथी–दल पर टूट पड़ा¸ मानो उस पर पवि छूट पड़ा। 

कट गई वेग से भू¸ ऐसा शोणित का नाला फूट पड़ा।। 

              जो साहस कर बढ़ता उसको केवल कटाक्ष से टोक दिया। 

           जो वीर बना नभ–बीच फेंक¸ बरछे पर उसको रोक दिया।। 


क्षण उछल गया अरि घोड़े पर¸ क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर। 

वैरी–दल से लड़ते–लड़ते क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर।। 

                   क्षण भर में गिरते रूण्डों से मदमस्त गजों के झुण्डों से¸ 

                  घोड़ों से विकल वितुण्डों से¸ पट गई भूमि नर–मुण्डों से।। 


ऐसा रण राणा करता था पर उसको था संतोष नही

क्षण–क्षण आगे बढ़ता था वह पर कम होता था रोष नहीं।। 

                      कहता था लड़ता मान कहां मैं कर लूं रक्त–स्नान कहां। 

                जिस पर तय विजय हमारी है वह मुगलों का अभिमान कहां।। 

भाला कहता था मान कहां¸ घोड़ा कहता था मान कहां? 

राणा की लोहित आंखों से रव निकल रहा था मान कहां।।

                  लड़ता अकबर सुल्तान कहां¸ वह कुल–कलंक है मान कहां? 

                      राणा कहता था बार–बार मैं करूं शत्रु–बलिदान कहां?।। 


तब तक प्रताप ने देख लिया, लड़ रहा मान था हाथी पर। 

अकबर का चंचल साभिमान उड़ता निशान था हाथी पर।। 

               वह विजय–मन्त्र था पढ़ा रहा¸ अपने दल को था बढ़ा रहा।

              वह भीषण समर–भवानी को पग–पग पर बलि था चढ़ा रहा।।


फिर रक्त देह का उबल उठा जल उठा क्रोध की ज्वाला से। 

घोड़े से कहा बढ़ो आगे¸ बढ़ चलो कहा निज भाला से।। 

                  हय–नस नस में बिजली दौड़ी¸ राणा का घोड़ा लहर उठा। 

              शत–शत बिजली की आग लिए, वह प्रलय–मेघ–सा घहर उठा।। 


क्षय अमिट रोग¸ वह राजरोग¸ ज्वर सन्निपात लकवा था वह।

था शोर बचो घोड़ा–रण से कहता हय कौन¸ हवा था वह।। 

                   तनकर भाला भी बोल उठा, राणा मुझको विश्राम न दे। 

                     बैरी का मुझसे हृदय गोभ, तू मुझे तनिक आराम न दे।। 

खाकर अरि–मस्तक जीने दे¸ बैरी–उर–माला सीने दे।

मुझको शोणित की प्यास लगी बढ़ने दे¸ शोणित पीने दे।।


मुरदों का ढेर लगा दूं मैं¸ अरि–सिंहासन थहरा दूं मैं। 

राणा मुझको आज्ञा दे दे शोणित सागर लहरा दूं मैं।। 

                    रंचक राणा ने देर न की¸ घोड़ा बढ़ आया हाथी पर। 

                  वैरी–दल का सिर काट–काट राणा चढ़ आया हाथी पर।। 


गिरि की चोटी पर चढ़कर किरणों निहारती लाशें
¸ 
जिनमें कुछ तो मुरदे थे¸ कुछ की चलती थी सांसें।। 

                           वे देख–देख कर उनको मुरझाती जाती पल–पल। 

                       होता था स्वर्णिम नभ पर पक्षी–क्रन्दन का कल–कल।। 

मुख छिपा लिया सूरज ने जब रोक न सका रूलाई। 

सावन की अन्धी रजनी वारिद–मिस रोती आई।। 


जय राजपुताना 

जय माँ भवानी 

जय एकलिँग नाथ जी

Thursday, 26 December 2013

क्षत्रिय वो है जो क्षात्र धर्म को आज तक भूला नहिँ है॥

गैरो की गूलामी को आज तक जिसने कबूला नहीँ है॥



जिसकी रगो मे राम का खून आज भी जिन्दा हो॥


भारत माता के अपमान पे जो आज भी शर्मिन्दा हो॥



जोहर की ज्वाला आज भी उसके सीने मे धधकती हो॥


शौर्य और वीरता की खुशबु आज भी उसकी आँखो मे महकती हो॥



शत्रू की ललकार सुन के जिसके सीने मे बिजलियाँ कङकती हो॥


तलवार को देख के आज भी उसकी भूजायेँ फङकती हो॥



चरीत्र उसका हिमालय जितना विशाल हो॥


आदर्श मे पुरी दुनीयाँ के लिये मिशाल हो॥



पाप और अधर्म को जो सह नहीँ सकता॥


हरिश्चन्द्र का वँशज है क्षत्रिय असत्य बोल कह नही सकता॥



दानवीर एसा की निज प्राणो के दान से भी पिछे नहिँ हटेगा॥


शरणागत की रक्षा मे शरणागत से पहले खुद कटेगा॥



हरिनारायण क्षत्रिय धर्म पे चलने वाला कभी झुक नहीँ सकता ॥


हजारो आँधिया आ जाये सच्चा क्षत्रिय कभी रुक नहीँ सकता ॥







जय क्षात्र धर्म॥


जय क्षत्रिय॥

Monday, 23 December 2013

#लड़का हैंडसम होना चाहिए, ‘स्मार्ट’ तो फोन
भी होते हैं।
#फोन तो आईफोन होना चाहिए, ‘S1, S2...S4’
तो ट्रेन के डिब्बे भी होते हैं।
#इंसान का दिल बड़ा होना चाहिए, ‘छोटा’ तो भीम
भी है।
#व्यक्ति को समझदार होना चाहिए, ‘सेंसटिव’
तो टूथपेस्ट भी है।
#टीचर ज्यादा नंबर देने वाला होना चाहिए, ‘अंडा’
तो मुर्गी भी देती है।
#युवा राष्ट्रवादी होना चाहिए, ‘कूल’ तो नवरत्न तेल
भी है।
#विकास गुजरात जैसा होना चाहिए, ‘निर्माण’
तो शौचालय का भी होता है।
#राष्ट्रपति कलाम होना चाहिए, ‘मुखर्जी’
तो रानी भी है।
#कैप्टन दादा जैसा होना चाहिए, ‘एमएस’ तो ऑफिस
भी है।
#बाथरुम में हेयर ड्रायर होना चाहिए, ‘टॉवल’
तो श्रीसंत के पास भी है।
#लड़की में अक्ल होनी चाहिए, ‘सूरत’ तो गुजरात में
भी है।
#मोबाइल जनरल मोड पर होना चाहिए, ‘साइलेंट’
तो मनमोहन भी हैं।
#सेब मीठा होना चाहिए, ‘लाल’ तो आडवाणी भी हैं।
#लड़का द्रविड जैसा होना चाहिए, ‘राहुल’
तो गांधी भी है।
#घूमना तो हिल स्टेशन पर चाहिए, ‘गोवा’ तो पान
मसाला भी है।
#कसाब को गोली मारनी चाहिए, ‘हैंग’ तो फोन
भी होता है।
#दवाई ठीक करने के लिए होना चाहिए, ‘टेबलेट’
तो सैमसंग का भी है।
#रिप्लाय ढंग का होना चाहिए, ‘हम्म’ को भैंस
भी करती है।